प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Period) Notes In Hindi+ PDF Download

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पृथ्वी पर मानव या इंसानों की मौजूदगी बहुत पहले से है और समय के साथ साथ इनमें निरंतर विकास भी होता आ रहा है । इस विकास क्रम में इंसानों ने आग जलाना, खेती करना, पशु पालन, एक दूसरे से बात करने के लिए भाषा का खोज करना, लिखने के लिए लिपि बनाना जैसे अनेकों विकास हुआ । मानव विकास क्रम का आज से पहले का जहां तक लिखित प्रमाण है उसे इतिहास (History) कहते हैं । इस इतिहास से पहले अर्थात जिस काल का कोई लिखित प्रमाण नहीं है अवशेषों और प्राप्त औजारों और उपकरण के आधार पर उस समय को प्रागैतिहासिक काल ( Prehistorical Period) कहते हैं ।

परिभाषा – प्रागैतिहास (Prehistory) इतिहास के उस काल को कहा जाता है जब मानव तो थे मगर किसी प्रकार के लिखाई का विकास नहीं हुआ था जिस कारण से उस काल का कोई लिखित प्रमाण नहीं है ।

विभिन्न इतिहासकारों ने प्रागैतिहास को निम्न तीन भागों में बांटा है –

  1. पाषाण काल (Stone Age)
  2. कांस्य काल (Bronze Age)
  3. लौह काल (Iron Age)
  4. पाषाण काल (Stone Age)

इस काल के नाम से ही पता चलता है कि यह काल पत्थर से संबंधित है । जब विभिन्न धातुओं की खोज नहीं हुई थी तब मानव विभिन्न कार्यों में पत्थरों का प्रयोग करता था । इस काल में आग की खोज हुई थी । विभिन्न प्रकार के पत्थरों से बने औजारों से इस काल का अनुमान लगाया गया ।

विभिन्न तथ्यों को ध्यान में रखते हुए पाषाण काल को पुनः 3 भागों में बांटा गया है –
(I) पुरापाषण काल (Paleolithic Age)
(II) मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age)
(III) नव पाषाण काल या उत्तर पाषाण काल (Neolithic Age)

(I) पुरापाषण काल (Paleolithic Age)


समय – 5 लाख ई. पू. – 10 हजार ई.पू.

मुख्य बिंदू

यूनानी भाषा में Palaios प्राचीन एवं Lithos पाषाण के अर्थ में प्रयुक्त होता था। इन्हीं शब्दों के आधार पर Paleolithic Age (पुरापाषाणकाल) शब्द बना
इस काल में लोग ज्यादा चीजों से परिचित नहीं थे उन्हें खाना पकाना, पशु पालन और धातुओं का ज्ञान नहीं था ।
इस काल के लोग पत्थरों से बने हथियारों से शिकार करते थे और ये ज्यादातर भोजन एकत्र करने के लिए जाने जाते थे ।
इस समय के लोग खेती – किसानी और धातुओं जैसे चीजों से अपरिचित थे ।
इस काल में मनुष्य ने सर्वप्रथम पत्थरों को रगड़कर आग जलाना सीखा ।
इस काल को पुनः तीन भाग – निम्न, मध्य और उत्तर पुरा पाषाण काल में विभाजित किया गया है ।
दक्षिण भारत में कुरनूल की गुफाओं में इस युग की राख के अवशेष प्राप्त हुए हैं ।
इतिहासकारों के अनुसार प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य सबसे लंबे समय तक इसी काल में था ।
पुरातत्त्वविदों ने पुणे-नासिक क्षेत्र, कर्नाटक के हुँस्गी-क्षेत्र, आंध्र प्रदेश के कुरनूल-क्षेत्र में इस युग के स्थलों की खोज की है । इन क्षेत्रों में कई नदियाँ हैं, जैसे – ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा भीमा, वर्धा आदि । इन स्थानों में चूनापत्थर से बने अनेक पुरापाषाण औजार (weapons) मिले हैं ।
सामान्य पत्थरों के कोर तथा फ़्लॅक्स प्रणाली द्वारा बनाये गये औजार मुख्य रूप से मद्रास, वर्तमान चेन्नई में पाये गये हैं। इन दोनों प्रणालियों से निर्मित प्रस्तर के औजार सिंगरौली घाटी, मिर्ज़ापुर एंवं बेलन घाटी, इलाहाबाद में मिले हैं।
भोपाल नगर के पास भीम बेटका में मिली पर्वत गुफायें एवं शैलाश्रृय भी महत्त्वपूर्ण हैं।
इस काल में लोग गुफाओं में रहते थे ।

(II) मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age)

समय के साथ मौसम में बदलाव होता गया और विकाशील मानव जातियां और अधिक विकसित होती गई । लगभग 1 लाख वर्ष तक मानव पुरा पाषाण काल में रही उसके बाद के काल को इतिहासकारों ने मध्य पाषाण काल नाम रखा क्योंकि यह समय पुरा पाषाण और नव पाषाण के मध्य का समय है । इस समय में लोगों ने कई अनेक चीजें सीखी ।

समय – भारत में 8000 ई.पू. – 4000 ई.पू.

मुख्य बिंदु –

इस काल में भी लोग गुफाओं में ही रहते थे ।
इस काल के लोग खेती करना सीख गए थे ।
जानवरों को पालने की कला लोगों ने इसी काल में सीखा । मानवों ने सबसे पहले कुत्ता को अपना पालतू पशु बनाया ।
इस काल के लोग मछली पकड़ना और शहद कठ्ठा करने में भी रुचि लेते थे ।
पश्चिम, मध्य भारत और मैसूर (कर्नाटक) में इस युग की कई गुफाएँ मिलीं हैं ।
मध्य पाषाण काल के अन्तिम चरण में कुछ साक्ष्यों के आधार पर प्रतीत होता है कि लोग कृषि एवं पशुपालन की ओर आकर्षित हो रहे थे इस समय मिली समाधियों से स्पष्ट होता है कि लोग अन्त्येष्टि क्रिया से परिचित थे। मानव अस्थिपंजर के साथ कहीं-कहीं पर कुत्ते के अस्थिपंजर भी मिले है जिनसे प्रतीत होता है कि ये लोग मनुष्य के प्राचीन काल से ही सहचर थे।
मध्य पाषाणकालीन मानव अस्थि-पंजर के कुछ अवशेष प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश के सराय नाहर राय तथा महदहा नामक स्थान से प्राप्त हुए हैं।
इस समय के प्रस्तर उपकरण राजस्थान, मालवा, गुजरात, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश एवं मैसूर में पाये गये हैं।

(III) नव पाषाण काल या उत्तर पाषाण काल (Neolithic Age)

इस समय मानवों में बौद्धिक और कौशल का बहुत ज्यादा विकास हुआ । इस काल के लोगों में अनुशासन आने लगी । पाषाण युग का यह अंतिम समय था इसके बाद लोगों को धातुओं का ज्ञान हो गया था । इस काल में लोगों का रहन सहन बिल्कुल बदल गया ।

समय – 4000 ई.पू. – 2500 ई.पू.

मुख्य बिंदु –

इस काल के लोग मिट्टी की दीवार बनाने और घर बनाना सीख गए थे ।
इनकी खेती करने का तरीका विकसित हो गया थे । इस काल में लोगों को बीज बोकर फसल उगाने की कला आ गई थी ।
इस काल में लोग कुशल कृषक और पशुपालक दोनों बन गया था ।
इस काल में लोग सिंचाई करने , फसल कटाई और अनाज का भंडारण करना भी सीख गए थे ।
इस काल में लोग मिट्टी के बर्तन भी बनते थे और उनपर कलाकारी भी करते थे ।
इस काल में लोग कबीले के रूप में रहते थे और कबीले का सरदार एक बलशाली व्यक्ति होता था ।
इस काल में लोग स्थाई रूप से एक जगह रहना प्रारंभ कर दिए । लोग खास करके नदी और झील के किनारे कबीले के रूप में रहते थे ।
इस काल में लोग विभिन्न जनजातियों में विभक्त थे ।
इस काल में लोग जल, सूर्य, आकाश, पृथ्वी, गाय और सर्प की पूजा (worship) विशेष रूप से करते थे ।
मेहरगढ़ में कई घरों के अवशेष मिले हैं, जो चौकोर और आयतकार हैं ।
उत्तर -पश्चिम में मेहरगढ़ (पाकिस्तान में), गुफकराल और बुर्जहोम (कश्मीर में), कोल्डिहवा और महागढ़ा (उत्तर प्रदेश में), चिरांद (बिहार में), हल्लूर और पैय्य्मपल्ली (आंध्र प्रदेश में) गेहूँ, जौ, चावल, ज्वार-बाजरा, दलहन, काला चना और हरा चना जैसी फसलें उगाने के प्रमाण मिले हैं ।

2. कांस्य काल (Bronze Age )

इस काल में लोगों को धातुओं का ज्ञान हो गया था । इस काल में लोग तांबे से तो परिचित थे मगर तांबे और रांगे के मिश्र धातु कांस्य से भी परिचित हो गए थे । इस काल में लोग पत्थरों की जगह कांस्य और तांबे के औजार और हथियार बनाते थे ।

मुख्य बिंदु

इस काल में लोग तांबे और कांस्य के बर्तन बनाते थे ।
लोग खेती किसानी में पारंगत हो गए थे ।

3.लौह काल (Iron Age)

मुख्य बिंदु

इस काल में लोग लोहे धातु से परिचित हुए और इसके बर्तन और औजार बनाने लगे ।
उत्खनन के परिणामस्वरूप भारत के उत्तरी, पूर्वी, मध्य तथा दक्षिणी भागों के लगभग सात सौ से भी अधिक पुरास्थलों से लौह उपकरणों के प्रयोग के साक्ष्य प्रकाश में आये हैं ।
उत्तर भारत के प्रमुख स्थल अतरंजीखेड़ा, आलमगीरपुर, अहिच्छत्र, अल्लाहपुर (मेरठ) खलौआ, नोह, रोपड़, बटेश्वर, हस्तिनापुर, श्रावस्ती, कम्पिल, जखेड़ा आदि है ।
हस्तिनापुर तथा अतरंजीखेड़ा से धातुमल (Iron Slag) मिलता है जिससे सूचित होता है कि धातु को गलाकर ढलाई की जाती थी ।
चित्रित धूसर पात्र परम्परा की तिथि रेडियो कार्बन पद्धति के आधार पर ईसा पूर्व आठवीं-नवीं निर्धारित की गयी है ।
नोह तथा इसके दोआब क्षेत्र से काले और लाल मृद्‌भाण्ड (Black and Red Ware) के साथ लोहा प्राप्त हुआ है जिसकी संभावित तिथि ईसा पूर्व 1400 के लगभग है ।
भगवानपुरा, माण्डा, दघेरी, आलमगीरपुर, रोपड़ आदि में चित्रित धूसर भाण्ड, जिसका संबंध लोहे से माना जाता है, सैन्धव सभ्यता के पतन के तत्काल वाद (लगभग 1700 ई॰ पू॰) मिल जाते है ।
यहां लौह उपकरण काले और लाल मृद्‌भाण्डों के साथ मिले है । इनमें बाणाग्र, छेनियां, कीलें आदि है ।
महिष्‌दाल से धातुमल तथा भट्टिया मिलती है जिनसे सूचित होता है कि धातु को स्थानीय रूप से गला कर उपकरण तैयार किये जाते थे ।
मध्य भारत (मालवा) तथा राजस्थान के कई पुरास्थलों की खुदाई से लौह उपकरण प्रकाश में आये हैं । मध्य भारत के प्रमुख पुरास्थल एरण तथा नागदा हैं । यहाँ से लौह निर्मित दुधारी कटारें, कुल्हाड़ी, बाणाग्र, हंसिया, चाकू आदि मिलते हैं ।

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