राजा राममोहन राय जीवनी [ Raja Ram Mohan Roy Biography]

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वे एक समाज सुधारक के रूप में पूरे भारत में प्रचलित हैं । उन्होंने कई ऐसे काम किए थे जिनकी प्रयासों की वजह से समाज से कई कुप्रथाएं समाप्त हुई  । इनके प्रमुख कार्यों में सती प्रथा की समाप्ति एक महत्वपूर्ण और प्रशंसक कार्य था । वे एक समाज सुधारक तो थे मगर वे रूढ़िवादी हिंदू अनुष्ठानों और मूर्ति पूजा के विरुद्ध थे जिस कारण से एक बार वे घर छोड़कर भी चले गए थे ।

प्रारंभिक जीवन

राजा राममोहन राय का जन्म 12 मई 1972 को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के राधानगर गांव में हुआ था । उनके पिता का नाम रामकांत राय वैष्णव तथा माता का नाम तारिणी देवी था । उनके पिता ने इनके शिक्षा में विशेष ध्यान दिया । इन्होंने प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हासिल की तथा बाद में उनके पिता ने इनकी अच्छी शिक्षा के लिए इन्हें पटना भेजा । वे एक बुद्धिमान व्यक्ति थे उन्हें बांग्ला, फारसी, अरबी और अंग्रेजी भाषा का ज्ञान था । उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा बांग्ला भाषा से ग्रहण की थी तथा उन्हें फारसी भाषा का ज्ञान अपने पिता से मिला जो फारसी भाषा के अच्छे ज्ञाता थे । इसके अलावा उन्होंने अपनी आगे की शिक्षा में अरबी तथा अंग्रेजी भाषा भी सीखे ।  इन्होंने कई भाषा पर पकड़ बना लिया जिसमें बंगला, फारसी, अरबी, संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, ग्रीक, फ्रेंच, लेटिन आदि भाषा सामिल है और एक सामान्य व्यक्ति के बस में इतनी भाषा का ज्ञान आसान नहीं है । उन्होंने संस्कृत का ज्ञान संस्कृत गुरु नंदकुमार से प्राप्त की थी और तंत्र- मंत्र विद्या भी हासिल की थी ।
वे बचपन से बुद्धिमान थे उन्होंने आगे चलकर कई वेद तथा हिन्दू धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया । वे आगे चलकर मूर्ति पूजा तथा हिन्दू अनुष्ठानों के प्रबल विरोधी बन गए थे ।  उन्होंने इन सबका खुलकर विरोध किया । पिता पूजा – पाठ में विश्वास रखते थे और पुत्र के विरोध के कारण उन दोनों में मदभेद हो गया जिस कारण से राम मोहन राय ने अपना घर त्याग दिया । यहीं से उन्होंने कई कठिनाइयों का सामना करना सीखा । वे घर त्याग कर हिमालय और तिब्बत क्षेत्र में चले गए । जब वे घर वापस लौटे तो माता पिता ने इन्हे सुधारने की इच्छा से इनका विवाह करा दिया मगर इन सभी चीजों का उनके विरोधों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा । वे अपने विरोध में डटे रहे । वे एक ईश्वर बाद के प्रचारक थे इसी कारण से उन्होंने आगे चलकर “ब्रह्मसमाज” का स्थापना किया था । विवाह के पश्चात वे वाराणसी चले गए और वहीं इन्होंने वेदों, उपनिषदों तथा हिन्दू दर्शन का गहन अध्ययन किया । विभिन्न अध्ययन के पश्चात उन्होंने “तुहपत अल – मुवाहिद्दिन” नामक पुस्तक लिखी । इसी बीच उनके पिता का 1803 में देहांत हो गया और इस घटना के पश्चात वे घर लौट आए ।
पिता के मृत्यु के पश्चात वे ईस्ट इंडिया कंपनी में राजस्व विभाग में नौकरी करने लग गए । इसी नौकरी करने के समय वे पश्चिमी संस्कृति एवं सभ्यता के संपर्क में आए तथा जैन तथा मुस्लिम मित्रों की मदद से एन दोनों धर्मों के बारे में आगे अध्ययन किया । वे ईस्ट इंडिया कंपनी के राजस्व विभाग में जॉन डिग्बी के सहायक पद में कार्य कर रहे थे । उनकी हिन्दू, मुस्लिम तथा ईसाई के बीच निष्पक्षता को देखते हुए एक अंग्रेजी अखबार में छपा था कि इन्हें गवर्नर जनरल बना दिया जाए ताकि वे निष्पक्षता से अपना कार्य कर सके इससे इनकी प्रसिद्धि के दर्शन होते हैं ।

पत्रकारिता

इन्होंने ब्रह्ममैनिकल मैग्ज़ीन’, ‘संवाद कौमुदी’, मिरात-उल-अखबार ,(एकेश्वरवाद का उपहार) बंगदूत जैसे कई प्रचलित पत्रों का संपादन प्रकाशन किया । बंगदूत नामक पत्र में बांग्ला, हिन्दी और फारसी भाषा का एक साथ प्रयोग देखने को मिलता था । 1821 में प्रतापनारायण दास के ऊपर जज के आदेश से कोड़े मारने की सजा दी गई जिस कारण से उनकी मृत्यु हो गई राममोहन राय ने अपनी पत्र में इस घटना का वर्णन किया था ।

समाज सुधारक कार्य

40 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी थी और कोलकाता में आकर रहने लगे थे और अपने आपको पूर्ण रूप से समाज सेवा कार्य के लिए इन्होंने समर्पित कर दिया था । वे एक श्रेष्ठ समाज सुधारक थे उनकी प्रयासों के कारण सती प्रथा का अंत हो सका । लगभग 200 साल पहले महिलाओं को सती प्रथा के तहत अगर पति की मृत्यु हो जाती थी तो उसके साथ ही जिंदा जला दिया जाता था । यह महिलाओं के हित को देखते हुए सही नहीं था । इसके अलावा सती प्रथा का कोई प्रमाण भी नहीं मिला । ऐसा माना जाता है कि सती प्रथा का आरंभ तब हुआ जब भारत में मुसलमान हमला करते थे और यदि भारतीय राजा की हार हो जाती थी तब रानिया अपनी आत्मसम्मान कि रक्षा के लिए कुएं में अथवा आग में कूदकर आत्मदाह कर लेती थी । ऐसा माना जाता है कि यहीं से सती प्रथा का आरंभ हुआ । सन् 1829 में गैरकानूनी घोषित कर दिया गया और राजा राममोहन राय तथा अंग्रेज़ गवर्नर लार्ड विलियम बैंटिक की सहायता से भारत में सती प्रथा पूर्ण रूप से समाप्त हो गया ।
समाज सुधार कार्यों में केवल यही एक कार्य नहीं था बल्कि इन्होंने बाल विवाह जैसे कुरीति का भी विरोध किया और वे हमेशा से ही चाहते थे कि नारियों को भी समाज में पुरुषों के समान ही अधिकार मिले । इसके अलावा इन्होंने लोगों के जागरूकता के लिए अनेक प्रयास किए । उन्होंने 1814 में आत्मीय सभा का गठन किया जिसका उद्देश्य बहू विवाह तथा संपत्ति में महिलाओं को भी हिस्सा देने पर जोर देना था । प्राचीन समय में सती प्रथा के समाप्ति के पश्चात बहुओं से कई अधिकार छीन लिए जाते थे इन सबका उन्होंने जमकर विरोध किया और विधवाओं के पुनर्विवाह को प्रोत्साहन दिया ।
इन्होंने महिलाओं के शिक्षा को भी प्रोत्साहन दिया । पहले यह माना जाता था कि लड़की पढ़ – लिखकर क्या करेगी आखिरकार आगे जाकर उसे घर ही तो संभालना है । यह एक ग़लत विचार था और महिलाओं को भी शिक्षा का भी समान अधिकार होना चाहिए ।
इन्होंने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की थी और इस कार्य में उनका सहयोग  द्वारकानाथ टैगोर ने दिया था । इसकी स्थापना कुछ प्रमुख सिद्धांत और उद्देश्य के साथ की गई थी जिसमे मुख्य जाति – धर्म में बंटे समाज को एक करना, एक ईश्वर वाद, स्त्रियों को सम्मान आदि था । इससे संबंधित प्रमुख सिद्धांत और उद्देश्य निम्न थे –
सिद्धांत –
 1. ईश्वर एक है और वह संसार का निर्माणकर्ता है।
2.आत्मा अमर है।
3.मनुष्य को अहिंसा अपनाना चाहिए।
4. सभी मानव समान है।
उद्देश्य –
1. हिन्दू धर्म की कुरूतियों को दूर करते हुए,बौद्धिक एवम् तार्किक जीवन पर बल देना।
2.एकेश्वरवाद पर बल।
3.समाजिक कुरूतियों को समाप्त करना।
इनका कई प्रयास सफल भी क्या कई लोग इनके बात से प्रेरित होकर स्वयं ही नारी शिक्षा को बढ़ावा देने लगे जिस कारण से आज महिलाओं को पुरुषों के समान ही अधिकार मिलने लगे हैं ।

मृत्यु

27 सितंबर 1833 में ब्रिस्टल के समीप स्टाप्लेटन में इनका देहांत हो गया ।

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