शिबू सोरेन जीवनी [Shibu Soren Biography In Hindi]

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बिहार से जब झारखंड अलग हुआ तब झारखंड ने न जाने क्या – क्या परिस्थितियां देखी । कई सरकार बनी तथा गिरी यहां तक कि राष्ट्रपति शासन भी लागू हुआ मगर एक ऐसा नया चेहरा सामने आया जिसने सबके ध्यान को अपनी ओर आकर्षित किया । शिबू सोरेन वह नाम था जिसने 3 बार मुख्यमंत्री पद पर रहकर लोगों के दिल में एक अलग जगह बना ली । इन्हें लोग गुरुजी के नाम से भी जानते हैं । वे एक आदिवासी नेता हैं । उन्होंने ऐसी भी परिस्थिति का सामना किया है कि पिता के देहांत के बाद लकड़ी बेचकर घर चलाया । उन्होंने अपनी जन्मभूमि के लिए कई कार्य किए । इन्होंने अपना पहला चुनाव 1977 में लड़ा था । उनके पिताजी आदिवासियों को महाजनों से मुक्ति दिलाने के लिए आंदोलन किए थे । शिबू सोरेन की जीवन आसान नहीं रही है जीवन में कई छोटे – बड़े उतार चढ़ाव भी आए हैं । मंझले बेटे और बड़े भाई के देहांत के बाद ही इन्होंने राजनीति में आने कि सोची ।

नामशिबू सोरेन
उपनामगुरुजी
जन्म तिथि11 जनवरी 1944
उम्र77 (11 जनवरी 2021 के अनुसार)
पिताशोबरन सोरेन
मातासोनामुनी सोरेन
जन्म स्थलनामरा, जिला हजारीबाग, बिहार
स्कूलगोला हाई स्कूल, हजारीबाग, झारखंड
पत्नीरूपी किस्कू
पुत्रदुर्गा सोरेन, हेमंत सोरेन, बसंत सोरेन
पुत्रीअंजलि सोरेन
व्यवसायराजनेता
राष्ट्रीयताभारतीय

प्रारंभिक जीवन

शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को बिहार के हजारीबाग जिले के नामरा नामक गांव में हुआ था । उन्होंने अपनी स्कूल की शिक्षा गांव में प्राप्त की । स्कूल की शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात उनके पिता ने इनका विवाह रूपी किस्कू से कर दिया । विवाह के पश्चात इन्होंने अपने पिता का खेती – किसानी में मदद करने की सोची । कुछ वर्षों के पश्चात पिता की हत्या कर दी गई जिस कारण से परिवार चलाने के लिए उन्हें लकड़ी बेचना पड़ा । वे अबतक राजनीति में नहीं आए थे । 23 जनवरी 1975 को इन्होंने बाहरी लोगों ( आदिवासी जिन्हें दिकु कहा जाता है ) को खदेड़ने के लिए जामताड़ा जिले के चिरूडिह ग्राम में एक हिंसक भीड़ का नेतृत्व किया था जिसमें 11 लोगों की जान चली गई थी । इस घटना के पश्चात 68 लोगों समेत इनके ऊपर कार्यवाही किया गया था । उनके चार बच्चे हैं जिनमें 3 लड़के और 1 लड़की है जिनका नाम क्रमशः दुर्गा सोरेन, हेमंत सोरेन, बसंत सोरेन एवं अंजलि सोरेन है ।

इनके मंझले बेटे और उनके बड़े भाई के मृत्यु के पश्चात इन्होंने 1977 में राजनीति में कदम रखा और यहीं से उनके राजनीतिक करियर की शुरुवात हुई । उन्होंने 1977 में टुंडी विधानसभा में चुनाव लडा था लेकिन इस चुनाव में उनकी हार हो गई थी । उन्हें राजनीति में प्रवेश में ही हार का सामना करना पड़ा फिर भी वे हार नहीं माने और निरंतर प्रयास में लगे रहे इस तरह 1980 में उनकी जीत हुई और ये जीत का सिलसिला चलते रहा । वे 2005 में पहली बार झारखंड के मुख्यमंत्री भी बने थे ।

राजनीतिक करियर

उन्होंने राजनीति करियर की शुरुवात 1977 में की थी मगर उन्हें पहली चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था । टुंडी विधानसभा में हार के बाद रुके नहीं । 1980 में उन्होंने दुमका लोकसभा की ओर से चुनाव लड़ा । वे एक अलग झारखंड राज्य की निर्माण की कामना से आगे बढ़े थे । 1980 के इस चुनाव में उनकी जीत हुई । इस जीत के पश्चात उन्होंने आगे कई चुनाव में जीत हासिल की । आगामी चुनाव वर्ष 1984 में उन्हें कांग्रेस के पृथ्वीचंद किस्कू से हार का सामना करना पड़ा था ।

वर्ष 1985 में हुए विधानसभा चुनाव में संथाल परगना में झामुमो में जीत हासिल हुई । वे जामा के विधायक चुने गए । 1989 में पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में गठित गठबंधन में शिबू सोरेन की जीत हुई और पुनः सांसद निर्वाचित हुवे वे राजमहल से झामुमो के ही साईमन मरांडी निर्वाचित हुए । 1990 में झामुमो बिहार विधानसभा में भी एक बड़ी पार्टी साबित हुई । इस तरह 1991 तथा 1996 तक वे दुमका लोकसभा से निर्वाचित होते रहे । 1998 का वर्ष उनके लिए सही नहीं रहा दुमका विधानसभा में वे बीजेपी के बाबूलाल मरांडी से हार गए ।

वे 2002 में झारखंड से राज्यसभा के सदस्य चुने गए । दुमका की लोकसभा सीट रिक्त थी क्योंकि 2000 में मरांडी को मुख्यमंत्री बनाया गया था जो उस क्षेत्र से चुनाव जीती थी । इस रिक्त पद को भरने के लिए 2002 में दोबारा से चुनाव करवाया गया । इस चुनाव में वे दोबारा सामने आए और बीजेपी के रमेश हेंब्रम को 94 हजार वोटों से हराकर दुमका में पुनः सांसद चुने गए । दुमका जैसा उन्हें छोड़ने वाली नहीं थी । 2004 में फिर मतदान हुआ इस बार बीजेपी की ओर से दुमका के लिए सोनेलाल हेंब्रेम उठे थे जिन्हें शिबू सोरेन नें 1 लाख से भी ज्यादा वोटों के अंतर से हरा दिया और दोबारा से लोकसभा के सदस्य चुने गए ।

2005 में वे एक बार कुछ विवादित तरीकों से झारखंड के मुख्यमंत्री बन गए थे मगर बहुमत साबित न कर पाने कि वजह से कुछ दिनों के पश्चात उन्हें मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा । 2009 में जेडीयू विधायक रमेश सिंह मुंडा की हत्या हो गई जिस कारण से तमाड़ विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव कराया गया । मुख्यमंत्री पद पर बरकरार रहने के लिए शिबू सोरेन को यह चुनाव जीतना जरूरी था । इस चुनाव में सोरेन झारखंड पार्टी के उम्मीदवार गोपाल कृष्ण पातर उर्फ राजा पीटर से 9000 वोटों के अंतर से हार गए थे । 2009 में ही जामताड़ा में विधानसभा और लोकसभा का चुनाव हुआ एन दोनों चुनाव में सोरेन कि जीत हुई थी । इस जीत के बाद उन्होंने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया और लोकसभा की सदस्यता बरकरार रखी ।

निजी जीवन

उनका विवाह रूपी किस्कू से हुआ है जिससे उन्हें 3 बेटे और 1 बेटी प्राप्त हुई । उनके चार संतानों के नाम इस तरह है – दुर्गा सोरेन, हेमंत सोरेन, बसंत सोरेन एवं अंजलि सोरेन । वर्तमान में उनके बेटे हेमंत सोरेन झारखंड के मुख्यमंत्री हैं । उनका सबसे बड़ा बेटा दुर्गा सोरेन 1995 से 2005 तक जामा के एमएलए (MLA) रहे हैं । वर्तमान में दुर्गा सोरेन की पत्नी जामा की MLA है । बसंत सोरेन झारखंड युवा मोर्चा के अध्यक्ष हैं ।

विवाद

28 नवंबर 2006 को सोरेन अपने ही पर्सनल सेक्रेटरी के अपहरण एवं हत्या के आरोप में आरोपी पाए गए । आरोप था कि सोरेन के पर्सनल सेक्रेटरी शशिनाथ झा को 22 मई 1994 को दिल्ली के धौला कुआं क्षेत्र से अपहरण करके ले लिया गया था और रांची के समीप पिस्का नगरी गांव में ले जाकर हत्या कर दी गई थी । इस हत्या के पीछे बहुत हेर – फेर हुई थी ।

प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह द्वारा मांग के पर सोरेन ने कोयला मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था । यह पहली बार हुआ था कि कोई केंद्रीय मंत्री किसी के हत्या के आरोप में दोषी पाया गया हो । 5 दिसंबर 2006 को वे हत्या के आरोप में दोषी पाए गए थे और उन्हें जेल भेजने की सजा सुनाई गई थी । यहां तक कि उनके बेल को दिल्ली कोर्ट द्वारा खारिज कर दिया गया था । उनके ऊपर सामूहिक हत्या समेत कई अनेक मामले में मुकदमा दायर किया गया है ।

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