क्रांतिकारी उधम सिंह जीवनी [Udham Singh Biography]

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क्रांतिकारी उधम सिंह भारत में जब अंग्रेज़ शासन कर रहे थे और भारतीयों पर अत्याचार कर रहे थे तब उनके मन में देश कि जनता को इंसाफ दिलाने का खयाल आया । जब 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था तब उधम सिंह भी वहीं मौज थे । वे इस हत्याकांड में बच गए लेकिन अंग्रेजों के इस अत्याचार के कारण वे बहुत ज्यादा प्रभावित हुवे थे क्योंकि इस हत्याकांड में करीब 1000 भारतीयों का बेरहमी से हत्या कर दी गई थी । इस घटना के पश्चात से ही उधम सिंह बहुत ज्यादा प्रभावित हुवे थे और वे इस घटना के आरोपी को सजा देना चाहते थे । उधम सिंह जलियांवाला बाग घटना का बदला ड्वायर की हत्या करके पूरी की और फांसी पर चढ़ गए । उनकी और भगत सिंह की जिंदगी लगभग समान ही है ।

नामशेर सिंह, उधम सिंह, राम मुहम्मद आजाद सिंह
जन्म तिथि26 दिसम्बर 1899
मृत्यु31जुलाई 1940

प्रारंभिक जीवन

उधम सिंह का जन्म 26 दिसम्बर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गाँव में हुआ था। उनका नाम शेर सिंह रखा गया था तथा उनका एक भाई भी थे जिनका नाम मुक्तासिंह था । जन्म के कुछ वर्षों के पश्चात 1901 में उनकी माता का निधन हो गया । माता कि मृत्यु को ज्यादा समय नहीं हुआ था और 1907 में उनके पिता का भी निधन हो गया । माता – पिता विहीन दोनों भाई अनाथ हो गए इस कारण से दोनों भाइयों को अमृतसर के सेंट्रल खालसा नमक एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी।

उन्होंने कभी भी अपने आपको माता – पिता के बिना कमजोर नहीं समझा । अनाथालय में ही उनका नाम बदलकर शेरसिंह से उधम सिंह रखा गया था उनके भाई का नाम मुक्ता सिंह से बदलकर साधु सिंह रखा गया । कुछ वर्ष ऐसे ही अनाथालय में बीता मगर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था । कुछ वर्ष के पश्चात 1917 में उनके भाई का भी देहांत हो गया । एक के बाद एक सभी करीबियों के छोड़ कर चले जाने पर वे बिल्कुल अकेले पड़ गए थे । 1918 में उन्होंने मैट्रिक परीक्षा उ्तीर्ण भी की इसके पश्चात 1919 में उन्होंने अनाथालय भी छोड़ दिया । वे एक नास्तिक थे और सभी धर्म के लोगों को समान मानते थे इसी कारण से उन्होंने अपना नाम “राम मोहम्मद सिंह आजाद” रख लिया । यह नाम विभिन्न धर्म के लोगों का एकता का प्रतीक था । 1919 में जब जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था तब वे भी वहां मौजूद थे इस घटना के से वे बहुत ज्यादा प्रभावित हुए थे इस कारण से उन्होंने बदला लेने की ठानी थी । इस हत्याकांड के मुख्य आरोपी जनरल डायर था जिसके आदेश पर हजारों भारतीयों की निर्मम हत्या कर दी गई थी । उन समय वहां के गवर्नर माइकल ओ ड्वायर थे जिन्होंने इस घटना को सही बताया था इसपर उधम सिंह बहुत नाराज हो गए थे और उन्होंने बदला लेने की सोची और माइकल ओ ड्वायर को उसके लिए का सजा देने का संकल्प लिया । कहा जाता है कि जनरल डायर कि मृत्यु बीमारी से नहीं हुवी थी बल्कि उसकी भी हत्या उधम सिंह ने की थी मगर इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता इसलिए इसे कही सुनी बात कहा जाता है ।

जलियांवाला बाग का प्रभाव

13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में बिना कोई वार्निंग के जनरल डायर के आदेश पर बाग में जमा हजारों भारतीयों पर गोली चला दी गई इस घटना में कई भारतीयों की मौत हो गई और कई लोग घायल भी हो गए । इस घटना में हजार से ज्यादा लोगों को हत्या कर दी गई थी लेकिन राजनीतिक तौर पर मरने वालों की सही संख्या को छुपाया गया था । बताया गया था कि 370 लोगों की मृत्यु हुई थी तथा 2500 के आस पास लोग घायल हो गए थे, यह एक सही संख्या नहीं थी । इस घटना के दौरान उधम सिंह भी वहां मौजूद थे तथा इस घटना के पश्चात वे काफी ज्यादा आक्रोशित हुए थे और इस घटना का बदला लेने कि ठान लिए । इस घटना के मुख्य आरोपी जनरल डायर था जिसने बिना कोई वार्निंग दिए गोली चलवा दिया था, वो कुछ बीमारियों की वजह से मर गया । इसके बाद एक घटना का दूसरा मुख्य आरोपी माइकल ओ ड्वायर था जिसने इस घटना को सही बताया था । उधम सिंह, माइकल ओ ड्वायर से बदला लेने चाहते थे ।

क्रांतिकारी संगठन से जुड़ाव

जलियांवाला बाग हत्याकांड के पश्चात उधम सिंह बहुत ज्यादा आक्रोशित हुवे थे इसके बाद वे क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गए । 1924 में वे गदर पार्टी से जुड़ गए इसके पश्चात वे इस क्रांतिकारी संगठन के साथ पैसे जमा करने के लिए दक्षिण अफ्रीका, जिम्बाब्वे, ब्राजील और अमेरिका जैसे देशों में गए और वहां से पैसे इकट्ठा किए और साथ ही साथ रिवाल्वर और गोला बारूद लाए । भगत सिंह के कहने पर 1927 में क्रांतिकारी संगठन वापस लौट आईं मगर अवैध हथियार और गदर पार्टी के प्रतिबंधित अखबार गदर की गूंज रखने के लिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 5 साल की उन्हें जेल हो गई । वे भगत सिंह के अच्छे मित्र और उनके बहुत बड़े प्रशंसक भी माने जाते हैं । यहां तक कि उधम सिंह भगत सिंह को अपना गुरु भी मानते हैं ।

माइकल ओ ड्वायर का हत्या

जब जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था उसके बाद से ही उधम सिंह ड्वायर से बदला लेना चाहते थे । कहें तो इस बात का संकेत देना चाहते थे कि भारत में क्रांतिकारी की आग सुलग चुकी है और सभी अत्याचारों का बदला लेने को तैयार है । जब उधम सिंह जेल से छूटे तो उनके ऊपर पुलिस की पैनी नजर थी । उन्हे पता नहीं था कि ड्वायर के हत्या का प्लान बन चुका है । वे कश्मीर चले गए और यहां से पुलिस की आंखो से ओझल हो गए । किसी को पता नहीं था कि वे कहां हैं । पुलिस उन्हें यहां भारत में है समझ रही थी और वहां वे जर्मन पहुंच गए थे । वहां उन्होंने रहने के लिए एक घर और कहीं आने – जाने के लिए एक गाड़ी किराए पर ले लिया था । कहीं से उन्हें खबर मिली कि 13 मार्च 1940 को एक बैठक है जिसमे ड्वायर भी उपस्थित होने वाला है । उधम सिंह ने ड्वायर से बदला लेने कि रणनीति बना ली थी और उन्हें 6 गोली वाला पिस्तौल भी कहीं से मिल गई थी ।

ड्वायर से बदला लेने के लिए उन्होंने एक कुशल योजना बनाई और एक मोटी सी किताब को खास तरह से काटा की उसके बीच में एक रिवाल्वर आ जाए ।बैठक के दिन वे समय के पहले ही कैक्स्टन हॉल पर पहुंच गए थे । सब कुछ सही चल रहा था वे मुफीद जगह पर बैठे हुवे थे । पूरा हॉल पूरी तरह खचाखच भरा हुआ था । ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी के बीच बैठक चल रही थी । उनके अलावा वहां कई भारतीय भी मौजूद थे । उधम सिंह ने ओवरकोट में वह किताब रखी थी जिसमें रिवाल्वर रखी हुई थी । बैठक जैसे ही खत्म हुई सब अपने स्थान से उठकर जाने लगे तभी उधम सिंह ने अपनी रिवॉल्वर निकाली और ड्वायर को दो गोली मारी । ड्वायर की मौके पर ही मौत हो गई । चारों तरफ अफरा – तफरी मच गई मगर उधम सिंह नहीं भागे । शायद उन्हें अपने बदला पूरा होने पर सुकून महसूस होने लगा था । उन्हें पुलिस द्वारा गीरप्त में ले गया और उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई ।

ड्वायर की हत्या का खबर एकाएक चारो तरफ फैल गई । किसी क्रांतिकारी ने घर घुसकर एक अंग्रेज़ को मारा था इसलिए चारों ओर उसकी तारीफ हो रही थी, यहां तक जवाहर लाल नेहरू भी खुद को उनकी तारीफ करने से न रोक पाया भले ही उन्होंने ड्वायर की मृत्यु का दुख जताया लेकिन उधम सिंह के बहादुरी का तारीफ भी किया ।

उधम सिंह की मृत्यु

ड्वायर की हत्या के आरोप में उधम सिंह हो गिरप्त कर लिया गया और कोर्ट में मुकदमा चला जहां उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई और 31 जुलाई 1941 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई । उधम सिंह देश के लिए अमर हो गए । 1974 में ब्रिटिश सरकार ने सम्मान के साथ उनके अवशेषों को भारत को सौंप दिया । उनके शहीद होने पर भगत सिंह की भांति इन्हे भी शहीद-ए-आजम सम्मान दिया गया । उधम सिंह के इस बलिदान ने भारत में क्रांतिकारी की आग को और बढ़ा दिया और अंग्रेज़ ज्यादा समय भारत में टिक नहीं सके और 9 वर्षों पश्चात 1949 को भारत को आजादी मिल गई ।

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